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ज्ञान -सागर

ज्ञान -सागर --------------- ज्ञान अनंत भवसागर, महाज्ञानी बने अल्पज्ञान, मैं से हम तक पहुंचा नहीं, फिर भी करें अभियान, आत्मसात ढाई अक्षर प्रेम का, जो है मूल आत्मज्ञान।। क्षण भंगूर धन-दौलत, पद- प्रतिष्ठा का नशा, सर चढ़ बोल रहा, घमंड/अहंकार के बोल। पंच तत्व मूलभूत जीवन आधार, अनमोल हैं, उपलब्ध निरंतर सभी को, बिन मोल-तोल।। सत्य झुठलाने, साबित करने झूठ को सच, सौगंध अपनों की, बन गई सत्य प्रमाण। सत्य हमेशा एक रूप है, झूठ के रूप अनेक, झूठ चार दिन, सत्य उजागर हो बिन प्रमाण।। हर कोई बड़ा हितैषी यहां, है अपनेपन का ठेकेदार, पीता रहता बिष/ खून के घूंट, कहता हर समझदार, अग्नि परीक्षा कभी हुई नहीं, वरना होते सब तार-तार।। स्वार्थ के सिवाय, कुछ नहीं निस्वार्थ यहां, मैं का दम हवा तक, वरना सब बेकार यहां, सब बोलने की बात है, कौन किसी का यहां।। कल्याण सिंह चौहान "दिल"