तुम और वह ( शराब )
ःः ःः तुम और वह ( शराब ) ःःःः ःःःःःःःःःःःःःःःः तुम्हारा प्यार जो मिला, दोस्त खफा हो बैठे। तड़फाने नाम लेकर तुम्हारा उपहास कर बैठे।। अलग हमें तुम से करने की, साजिश कर बैठे। कसम देकर तुम्हारी, उससे मेरी दोस्ती करा बैठे।। पाने तुम्हें मै, अपना सब कुछ दांव लगा बैठा। नफरत थी जिससे, उसे ही अपना बना बैठा।। माना कि मैं गलत था, अपने होश गंवां बैठा। तुम तो होसोहवास मे थीं, क्यों गलती कर बैठी। सच है तुम्हारा नाम लेकर, कमस ली थी हमने। बहकावे मे आ के गैरों के, तुम क्यों रूठ बैठी।। रूठ कर मनाने से मान जाने को, प्यार कहते हैं। कुछ पाने नहीं, सब कुछ लुटाने को, प्यार कहते हैं।। ःः कल्याण सिंह चौहान ःः