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Showing posts from September, 2023

ऋतु

      # ऋतु #               तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा। तेरा एक रूप रंग बसौंदु ऋतु, ये दिल मा। तबि तु दिखेंदि ऋतु,  है का रूप,  रंग मा।। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।। कभी ताति- पतंगार, कभी गीलि- बसग्याल, कभी अल्डकार- चचकार, लगदि ऋतु।। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।। कभी फूल रातराणि, कभी लिम्बे सी दाणि, कभी कामदेवै रति राणि लगदि ऋतु। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।। कभी मस्त हिरणि, कभी जलेबी सी घिरणि। कभी प्यारौ हवनकुंड, लगदि ऋतु।। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।। कभी पैलि बरखै सी कुमरियांण,  कभी आगौ सी भभर्यांण। कभी घ्यू कि सी सुमरयाण, लगदि ऋतु।। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।। मुखड़ि नौणै गोंदगि, होंठड़ि शैदै सी कंसळि। आंखि हिंसरै सी गोंदगि, लगदि ऋतु।। तेरा कै रूप, कै रंग बसौं, ऋतु ये दिल मा।।       # कल्याण "दिल"#

सुमन स्याळि

 ## सुमन स्याळि ##      :::::::::::::::::: मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, क्या जि लिखूं, क्या जि सोचूं, तेरा बारा मा। घड़ी-घड़ी बदलदि सोच मेरी, घड़ी-घड़ी बदलदा, बोल मेरा, तेरा बारा मा। मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, क्या जि लिखूं, क्या जि सोचूं, तेरा बारा मा। इन जी लिखूं, कि उन जी लिखूं, तेरा बारा मा, दिल बोलदु, इन भी न, उन भी न लिखूं। मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, क्या जि लिखूं, क्या जि सोचूं, तेरा बारा मा। तु छै स्याळि, अपणि भांति, अपणि तरांह, कैकि भांति, कैकि तरांह, किलै लिखूं, किलै सोचूं। मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, तेरा बारा मा। फ्योलि-बुरांस, घुघति -हिंलांस, कुछ नि छन, तेरि होंठिड़ि- गलोड़ि- आंख्यूं का समणि। मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, क्या जि लिखूं, क्या जि सोचूं, तेरा बारा मा। हिंवळि डांडि-कांठि, फुल्वी कंळि-पाखि, फीकी छन, तेरा रंग-रूप, ज्वनी का बारा मा। मेरी स्याळि, प्यारी स्याळि, सुमन स्याळि, क्या जि लिखूं, क्या जि सोचूं, तेरा बारा मा।            कल्याण सिंह चौहान "दिल"