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Showing posts from January, 2021

लोग अर हम

    ःःःः लोग अर हम ःःःः             ःःःःःःःःःः लोख्वी छुप्यूं कू असर हम पै, हमरी छुप्यूं कू असर होंदू लोखू पै। लोग सुणदा,गुणदा,भाग देंदा, फिर सौ सवालू एक जबाब, अणसुणि करी चुप ह्वे जांदा, हम लोख्वी सूणी अणमणा ह्वे जांदा।। लोख्वू देखणौ असर हम पै, हमरा देखणौ असर होंदू लोखू पै।। लोग देखी आंखि झुकौंदा, झुकी आंखि उठैकि मुल हैंसदा, हम लोखू देखी भी अजाण बणया रैंदा।। लोख्वी समझ-समझौणौ असर हम पै, हमरी समझ-समझौणौ असर होंदू लोखू पै।। लोग समझी-बूझी भी शांत, न क्वी स्वी न सै, हर बात पै सचेत, हम ना समझ, न समझी भी समझदार।। लोख्वी सुण-सुणौणौ असर हम पै, हमरी सुण-सुणौणौ असर होंदू लोखू पै।। लोग ज्यादा सूणी, कम सुणौदा, धीर गंभीर, बिना बोल्या, हम लोख्वी नि सुणदा,  अफरी सुणौदा लोखूं, बिना रुक्यां।। लोख्वी छुप्यूं कू असर हम पै, हमरी छुप्यूं कू असर होंदू लोखू पै।।         ःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः                 ःःःःःःःःःःःःःः

बिसिरि गेन

 ःःःःः  बिसिरि गेन ःःःःः         ःःःःःःःःःःः बिसिरि गेन भूलि गेन, उ पुरणी बात। नौ रत्ता मंडांण, बिसिरि गेन, उ पंडौंं  की बात। चैतौ पसरु दर्ज्यूं कू, नि रैन उ पंवंणौं की रात ।।  नी सूणेदा नानि-दाद्दिया, रात्यूं कथा-पखंणा । नी सुणेदी गुवैरुवी बंसुलि, घसेरियूं का गीत खुदेड़।। गोरुवी गोट नी होंद, क्वी नि जणदू कटुला भदाड़।  सत्तु भुजेलू नी बणदू,  कंडली बसिंगै भुजि साग।। घ्यू दूदै पै, अधूड़ि, सेर, हरचिगेन माणी पाथी। परया, परोठी, कमोलि नी रैन, दोंण, कुलड़ौं की बात।। बोडा.बोडी,काका.काकी, नी बोलदा जेठि, कंणसी। जेठु,मंजीलू,कंणसु,ठूला, नी बोलदा दिदा भूली।। सीसफूल, मुर्खि, बुलाक, नी पैरदा हंसुली खगोली। कमरबंद, करदोड़, पौंछी, नी जणदा लच्छा झंवौरा।।   ःःःःःःःः  कल्याण सिंह चौहान ःःःःःः

कवि

             ।।।ःःःःकविःःःः।।       दर्द दिया होगा इतना, जालिम जमाने ने।     आंसुओं को नापा होगा, कलम के पैमाने ने।।         असहाय वेदना से, जब मन छटपटाया।         सच्चाई बयान की, कागज के आइने ने।।         कुछ कर गुजरने, बढ़ा ग्लानि भरे मन से।         रोका होगा कागज पर, उकेरे शब्दों ने।   दर्द दिया होगा इतना, जालिम जमाने ने।   आंसुओं को नापा होगा, कलम के पैमाने ने।।          निर्बलता से उठाने, झकझोरा होगा अर्न्तमन ने।          ढाल तलवार रूप लिया होगा, कागज कलम ने।।          रुकती धड़कने सहलाई होंंगी, आती श्वासों ने।          अस्थिर मन बहलाया होगा, पुष्पगुच्छी शब्दों ने।।    दर्द दिया होगा इतना, जालिम जमाने ने।    आंसुओं को नापा होगा,कलम के पैमाने ने।।            मेमना सा फंसा होगा जब, भेडि...

पुष्पा मेरू मन

  ।।।ःः पुष्पा मेरू मन ःः।।।           ःःःःःःःःः त्वे मा लगीगे पुष्पा, मेरू मन ।  कनकै बतौऊ पुष्पा ,मेरू मन। कनकै त्वे मिलू पुष्पा, मेरू मन।  त्वे से,त्वे पै, त्वे मा पुष्पा, मेरू मन। त्वे मा लगीगे.... तेरा सुपन्यों पुष्पा,  मेरू मन।  कभी हंसौंदा पुष्पा, मेरू मन।  कभी रुलौंदा पुष्पा, मेरू मन। कभी सागर सी गहराइयूं पुष्पा, मेरू मन। त्वे मा लगीगे.. तेरी रत्न्यालई आंख्यूं पुष्पा, मेरू मन। तेरू मुलमुल हैंसूणौं पुष्पा, मेरू मन। तेरू मठुमठु हिटणू पुष्पा, मेरू मन। तेरि प्यारी सुरत बसिगे पुष्पा ,मेरू मन। त्वे मा लगीगे.... तेरा औंण जांणा बाटों पुष्पा, मेरू मन। औंदू जांदू त्वे देखूणो पुष्पा, मेरू मन। तेरि मिठ्ठी बोली सुणणौ पुष्पा, मेरू मन। कुछ तेरी सुणणौ, कुछ अपणी सुणणौ पुष्पा, मेरू मन। त्वे...   त्वे मिलणै आश पुष्पा, मेरा मन। नी कटदी रात त्वे बगैर पुष्पा, मेरा मन। त्वे पौण खोणै उलझन पुष्पा, मेरा मन। तु हर श्वांस, हर आश बसिगे पुष्पा, मेरा मन। त्वे मा लगीगे.... त्वे मा लगीगे पुष्पा, मेरू मन। त्वे मा.....।.         ...

शंमा

                 ःःः शंमाःःः न लगाओ इल्जाम शमां पे शरेआम, दिवानो को जलाने का। दिवाने से पूछो क्यों खुद चले आते हैं,शमां को मिटाने को।। न बुझी शमां तो जल जाते हैं, शमां को बदनाम करने को। रंगीन बनाने अपनी महफिल, दिवाने ही जलाते हैं शमां को।। परवाने एक बार जलते हैं, हर रात जलना पड़ता है शमां को। न लगाओ इलजाम शमां पे शरेआम, दिवानो को जलाने का।।       ःःःःःःकल्याण सिंह चौहान

सपना

         ।।ःःःः सपना ःःःः।। न फेरो सामने से, चांद सा मुखड़ा । मुझे ये अपना प्रतिबिंब, सा लगता है।। न गिराओ चिलमन यूं, सुंदर से मुख पे । मुझे ये अपना प्रतिद्वंद्वी, सा लगता है ।। न बनो तुम मेरी, मुझे कोई गम नहीं । अपना सबकुछ, तुम्हारा सा लगता है ।। न किया करो यूं , हर वक्त हमें नज़रअंदाज। मुझे दिल अपना, एक ज़ख्म सा लगता है।। न पटका करो यूं, जमीन पर तुम पांव । मुझे अरमान अपना, टूटता सा लगता है।। न बनो मेरी, पर सपनों मे यूंही आया करो।  तुम्हारा सपना ही तो मुझे, अपना लगता है।।   ।।ःःःःकल्याण सिंह चौहान ःःःः।।                ःःःःःःःःःःः

नौ- तेरु

 ।।।ःःःः नौ तेरू ःःःः।।। देखि ज्वा तेरी, स्वांणी मुखड़ी, मैं अपणी , शुदबुद ख्वै ग्यौं।। मिली ज्वा त्वै से, नजर मेरी, मैं आंखी झपझौण, भूली ग्यौं। आई  ज्व् याद तेेेरी, याद मा तेरी, मैं दुनियादारी भूली ग्यौं। मिलण का छणू मा तेरा, मैं अफी तैं भूली, जड़ ह्वे ग्यौं। ऐ औणै आहट तेरी, मैं सब भूली, त्वेमा रमी ग्यौं। ऐ, हवा ज्वा, तेरा तरफै, मैं श्वास लेणू, भूली ग्यौं।। तेरा प्यार मा, जीणू, मैं जीणू, भूली ग्यौं। प्यार एक तीस, बुझै नि बुझदी, मैं प्यारे तीस, पे की हारी ग्यौं। अजाण दिल दुनिया छोड़ी, मैं से मैं छोड़ी, तेरू ह्वे ग्यौं। तेरू नौ मिन, कै मा नि बोली, बोली लोखून,आखिरी क्षण, "राम "नाम सत्य ।।          ःःःःःःकल्याण सिंह चौहान ःःःः                    ःःःःःःःःःःःः

जीवन के तीन बिन्दु

        ।।ःःः जीवन के तीन बिन्दु ःः।।                   ःःःःःःःःःःःःः दुनिया से बेखबर, प्यारी सी मुरत, गोरखधंधौं से दूर, भोली सी सूरत,  प्यार से भरे भाव, चाहे पाना जिसे, दुबारा हर कोई, पा न सके कोई, बचपन है उस सपने का नाम।। उफनते बरसाती नाले, तेज तरार, लड़ने भिड़ने, भला बुरे की न सोच, आसमान की ऊंचाइयों को छूते, लड़ाकू विमानों से बात करता, जोश  जवानी है।। जर्जर अस्थि पंजरों के,  ढीले होते नट बोल्टों के, रुकरुक कर, उचित समय, उचित स्थान पर, सभी दायित्वों को निभाने वाली स्थिति का नाम, बुढापा है।।           ।।ःःःःकल्याण सिंह चौहान ःःःः।।                    ःःःःःःःःःःःःःःःः

ज्वान ह्वेली तू

 ।।ःःःः-" ज्वान ह्वेली तू "ःःःः।।                ःःःःःःःःःःःःःः बांदू मा कि बांद पुष्पा , ज्वनू मा कि ज्वान , आंख्यूं कर दि बात पुष्पा , हर दिलै मुस्कान ।। रूप रंगै खान पुष्पा , चढ़ी ज्वनि परवान , लाल गल्वड़्यू पुष्पा , काला तिलै पहचान ।। पूर्णमसी सी जोन पुष्पा , नशै की दुकान , छड़छड़ा बदनै पुष्पा, कथगा दिल्वी जान ।। ज्वनूवी चढ़ी जुबान पुष्पा , लखु दिल्वी अरमान, लोखुवी कंदुड़ि पुष्पा , तेरा मिठ्ठा बोल्वी रस्याण ।। गीतौ सी ज्ञान पुष्पा , मंदिरौ सी गान , जै कौथिग जांदि पुष्पा , वे कौथिगै शान ।।        ।।।।ःःःः कल्याण सिंह चौहानःःःःः।।।।

अजीब- इंसान

          ।।ःःःः अजीब इन्सान ःःःः।।             ःःःःःःः।।।।।।ःःःःःः अजीब तेरी कहानी रे, मूर्ख इन्सान, चितै आग जांदी, तेरी अकड़ रे इन्सान।। पैदा होंदू रौंदी तू, हंसदी दुनिया, अंतिम वक्त चुप तू, रौंदी दुनिया, जीवन भर करदी तू, बकबक रे इन्सान।। पैलू कपड़ा पैनी तिन, बिना कीस्सौ लंगोट, अंतिम कपड़ा उड़ै त्वे, अणसिलू कफन, जीवन भर लगे तू, कीस्सा भोर रे इन्सान।। पैदा होंदू बिना सहारौ, चनफिरन से लाचार, अंतिम यात्रा तेरी, तेरि सांग लगेन कंधा चार, जीवन भर करदे तू, मैं मैं रे मूर्ख इन्सान।। होंदू गुड़ौ मिठ्ठू, जांदू खीर खै लोखून, तेरा होंदू तेरा जांदू, त्वे नवै धुवै लोखून, भलौ हे राम, बुरौ बला चलगी रे इन्सान।। पैदा होंदू दुनियौ तेरि, ग्यारह दिनै छूत, तेरह दिनै मोरदू तेरा, लोखूकू ह्वेगी छूत, जीवन भर कर दी तू, छुवाछूत रे इन्सान।। तेरि बरति लोग अगनै, तू पिछनै पिछनै, मुर्दनी तेरी तू अगनै, लोग पिछनै पिछनै, सुखौ दगड़, दुःखौ पिछनै दुनिया रे इन्सान।।     ःःःःःःकल्याण सिंह चौहानःःःःः                ःःःःःःःःःःःः...

बेटी- बिदै

              ःःःःःःःः बेटी बिदै ःःःःःः                      ःःःःःःःःःःःःःःःः ब्वे बब्बू आशीष बेटी, ली जा भै बैणौं कू प्यार। मैत जन्मौ ठौर बेटी,  सैसुर तेरू सच्चू घौरबार।। मैतै खुद न लगू कभी,  मिलु सैसुर त्वे इथगा प्यार। जीति दिल सभ्यूंकु बेटी, अपणा कुशल व्यवहार।। ब्वे बब्बूई लाडली छैं तू,  छैं भै बैंणौं कु लाड प्यार। मैता सुसंस्कारून बेटी, सज्जै अपणू नयू संसार।। बड़ु भागि बोलदि दुनिया, जु करला कन्यादान। प्यारै पली सैंती लाडी, ह्वेगी आज द्वी घरू मान।। खुशियूंन भोरि रौ झोली तेरी, बिंवैंं कि भी नि हो बात। तेरा जीवन, घौरबार बेटी, बणी रौ हमेशा बसन्त बहार।। बेटी ब्यवौणे दुनिये रीत, खून नि ह्वे कभी परै। ब्वे बुब्बा छौंदु मैत बेटियूं, बाकि कुछ नी रै।।                   ःःःः कल्याण सिंह चौहान दिल ::::                                    ःःःःःःःःःःःःःःः

पैल्या लोग

 ःःःःः पैल्या लोग ःःःःःः        ःःःःःःःःःःःःःःः पैल्या लोग बल आंख्यूं कि शर्मन, मोरजांदा छा । अब कै शर्मदार भी बल,नि औंदि एक छींक भी ।। पैल्या लोग बल, खूब करदा छाई, ठठ्ठा मखोल । अब अपणौ दगड़ नि लगौंदु क्वी, हैंसी छूईंबत ।। पैल्या लोग, मुखड़ि देखी समझी जांदा छा मनै बात। अब गौला भिंटे-भिंटे भी, सब एक हैका से अजाण ।। पैलि एक मौ कु पौंणु, होंदु छाई सरा गौं कु पौंणु । अब पीठ्या भैबंध भी, सोराभारौं से फुंड गौं लेख ।। पैल्या लोग चिठ्ठी पौढ़ी, समझी जांदा छा सब बात । अब एक कूड़ा रै, भै बंध भी नि जणदा कैकि बात ।। पैल्या लोग बांटि-च्यूंटी खांदा छा, पैंणैं पकोड़ी भी । अबा लोखू  मैं खौं, मेरा खौंन, बाकि क्वी न रौन ।। पैलि लोग बाटा बटोंयूंं भी पुछदा छा भै-बैणि कै कि। अब भै-बैणा छोड़ा, सुवैणि-मैस भी बुलौंंदा नौ लेकि।।        ःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः             ःःःःःःःःःःःःःः  

मुझे मालूम नहीं

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 ःःःः मुझे मालूम नहीं - MUJHE MALUM NHI ःःःः      ःःःःःःःःःःःःःः कैसे बताऊं तुम्हें, कितने करीब हो तुम मेरे दिल के । दिल की बात बताने का तरीका, मुझे मालूम नहीं ।। कैसे दिखाऊं, अपने दिल में बसी तस्वीर तुम्हारी । है कौन सा आइना दिखाने का, मुझे मालूम नहीं ।। कैसे समझाऊं तुम्हें, कितना प्यार है हमें तुम से । किस तराजू तौलती प्यार दुनिया, मुझे मालूम नहीं ।। सच है जो मैंने कहा, जो प्यार में तुमनें सुना । कहते हैं प्यार भरोसे टिका है, मुझे मालूम नहीं ।। सच कहूं, तुम्हारे सपने, मुझे कभी आते नहीं । एक पल भी तुम, मुझ से जुदा हुए, मुझे मालूम नहीं ।। कितने अरमान संजोए हैं, मेरे दिल ने तुम्हारे लिए। तुम्हारे सामने क्यों भूल जाता हूं, मुझे मालूम नहीं ।।    ःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः

फर्क प्यार मे

 ःःःः फर्क प्यार मे ःःःः         ःःःःःःःःःः फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे, मुझे तेरे प्यार के सिवाय, कुछ दिखता नहीं, तुम्हें मेरी कमियों के सिवाय, कुछ दिखता नहीं।। मुझे प्यार है बस, एक तेरे प्यार से, तुम प्यार मे भी बस, अपने फायदा देखते हो, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।। मेरे दिल दिमाग पे, नशा चढ़ा है तेरे प्यार का, तुम्हें नशा वहम का, प्यार है तुम्हारी ठोकरों पे, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।। मेरा प्यार तुम हो, बस तुम ही तुम, तुम तौलते हो प्यार को भी, शक के तराजू मे, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।। तेरा प्यार मिला मुझे, मुझे सब कुछ मिल गया, बहाने प्यार के तुम, यार बदलते हो कपड़ों की तरह, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।। मेरे लिए प्यार पूजा है, पूजा ही प्यार है, तेरी पूजा भी दिखावा, तेरा प्यार भी दिखावा है, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।। मैं डूबा हूं, तेरे प्यार की गहराइयों मे, तुम्हें बहाना मिल गया कि तुम्हें तैरना आता नहीं, बस फर्क इतना सा है, मेरे और तेरे प्यार मे ।।   ःःःः क...

बूढ-बुढ्या

 ःःःःःः बूढ-बूढ्या ःःःःःः         ःःःःःःःःः गारु माटु जोड़ि-जाड़ि, जोड़ि-जाड़ी लखड़ा पतड़ा, हडगि मुडगि तोड़ि ताड़ी, फंजोड़ि फंजाड़ि गतबस्त, ल्वै का आंशु चुवैं-चुवैं, बणैई कूड़ि ।। पालि सैंती, पढ़ै लिखै, ज्वान पठ्ठा कै नि, खलै पिलै, कर्जपात कैकि बिव्वैन, सम्पयूं खफा खाणुकू।। जणि क्या लिख्यूंं, भाग हमरा, नौनै दगड़ बुव्वारि चलिगि, बोलि मारिकी, बाल बच्चों कु भविष्य देखण अपणा, देश मा पढ़ै लिखै की।। कै कु बोन, किलै बोन, समझौणु कू, गौं कि पढ़ै लिखै बल गोरुवा लेख, पढ़णवलौं कु घौर बोण एक पढ़ै लिखै, बानु बच्चों कू, क्या कन लौड़ि की।। बुढ-बुढ्या कूड़ि जगोलनान एखुलि, उल्या-पल्या खाला/दासा बैठि की, लोलि लालसा नि छुटदि अपणौ की, आशा लगी रैंदि, मोन तकै की।। बूढ़-बुढ्यों की डबलौंदि आंखि, बबलौंदा होंठ, कंपदा हाथ-खुटा, छौंदा कुटम्ब, हुंगरा देणू भी नी दगड़ क्वी।। सच्चि बात, जगदि मुछेलि पिछने ही औंद, औण सभ्यून ईंही उम्र, याद राखा सभी।।  ःःःः  कल्याण सिंह चौहान "दिल ":::०::

धेला. पैंसा

 ःःःः धेला. पैंसा ःःःः ःःःःःःःःःःःःःः धेला पैंसौं कि ह्वेगि दुनिया,   ह्वेगि धेला पैंसौं की सेवा सौंलि, अंगोठि्या छापू उठणु-बैठणु,  खाणु-पेणु, बोन-बच्याणु ह्वेगि फैसन।। पढ़्यां-लिख्यां खोतड़ा खाणा,  पढ़ै-लिखै सब धरी रैगि, लंमडेर-नीकजू, खांणै बोदर ह्वेगि, खाणा भी पोड़िगेन लंगंण।। धेला पैंसौं कि माया देखा,  पीठिया भै-बंध भी दूर ह्वेग्या, मुर्दनी त बात क्या बोन,  मुख जात्रौ भी वक्त नि रैगि ।। पता च सभ्यूंं, दगड़ नि जाण कुछ, फिर भी लगयां च सभि, जमा करण पै, लूट-खसोट करी, अपणौ भी धोखा देकि, पैंसा-पैंसा  हाइ पैंसा, कनु पैंसा ह्वे।। अफु खाण न पेण, न खलौण कै, जमा करणा जौंकु, सौं भी खांदा उंका, झूठ कन बोलदा, सभी सूणा, गौल्या/बच्चों सौं कैमू एक लाल धेला भी।।     ःःःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः

को. रौ. णा.

  ःःःः ःः ( को.रौ.णा)ःःःःःः  ःःःःःःःःःःः क्या बोन, कन बिमरि ऐगि,   क्यान ह्वे, किलै ह्वे, बिमरियू अतु न पतु, न दारु,न दवै, कथगा मनखियूंन जान गवै।। क्या बोन कन वक्त ऐगी, दुःखै त बाती नी च, सुख मा भी क्वी, दगड़ नि रैगि, को.रो.णा. नौ कि बिमरि ऐगि।। कख ऊठि,कख बैठि,कख चलि पता नी च, भगवानै बंणई दुनिया मा, मनखियूं कि छेड़छाड़ौ नतीजा त नी च।। शान शौकत, पैंसा धेला, सब धरियू रैगि, छौंदा अपणा कुटुम्ब परिवार, मनखि ईं बगमरि एखूलि ह्ववेगी।। बोनान मनखि चंद्रमा, मंगल पौचिगि, विज्ञान करणू च उन्नति, क्वी बताउ प्रयाय क्या खूनौ, ईं बिमरि सब ह्वेग्या फेल।। भौत मुस्का बंदेन गोरू, चखुला कैनि पिंजरा बंद, वक्तै मार पोड़ि, मनखि मुस्का लगै घौरु बंद, गोरु चखुला सब स्वछंद ।। भै बंदू बोलचाल बंद, औणि जाणि अकड़ बंद, वक्त न यन करि, मुर्दनी त बात क्या, मुखजात्रौ भी नी मीलि छंद।। अभी भी वक्त च,  मनखि छां,मनख्यात मा रिया, खाणु पेणु, बोनु चलणू मनखियूंन सी राखा ।। ःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः

गीता

 ःःःः गीता ज्ञान ःःःः ःःःःःःःःःःःःःःः गीता एक शब्द, किताब नहीं, अलौकिक दृष्टि है। ब्रह्म ज्ञान युक्त, आत्म साध, सूक्ष्म रूप सृष्टि  है।। गीता, गंगा, गायत्री, गौ का मान, मां सम्मान है। मानसिक, आंतरिक, बाह्य युद्ध, जीत प्रमाण है।। प्रभु मुख प्रवाहित गीता, दिव्य प्रकाश पुंज  है। धुंध छटी धर्म क्षेत्र मे परिवर्तित हुआ, युद्ध क्षेत्र है।। शांत चित्त, धर्म विश्वास, प्रभु पाद एकाग्र ध्यान हो। वरना शिव संग सती, कृष्ण सखा अर्जुन क्यों न हो।। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, गीता समाहित मोक्ष मार्ग है। प्रभु समर्पित कर प्रत्येक कार्य, यही गीता संदेश है।।           ःःःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःःःः

हैप्पी नयु साल

 ःःःः हैप्पी नयु साल  (गढ़वली) ःःःः    ःःःःःःःःःःःःःःःः बधै देण वलौं कु तांतु लगियूं च, क्या बोन रूढ़ियों कि सी बाढ़ अईंच, लगणू सभी अपणा कलेजा सी कत्रि होला। देखणू कू ही न्यारा न्यारा होला, जन एकै गौलियू पाणि हैकै गौलि जलु, जन एकै जुकुड़ि हैकै जिकुड़ि धकधेलि।। बधै भी कैकि जौंसे हमरू नातु नपातु, लग्यांं च सभी हैप्पी हैप्पी लेखण मा विरणा त्यौहारू जबरदस्ति मणौण मा।। अपणा बार.त्यौहारू कै पता नीच, चैत शुक्ल प्रतिपदा सनातनी साल शुरू, हैप्पी होलि, नौरता, जन्माष्टमी, शिवरात्रि लग्या च।। बग्वाल. इगासा भैला हरचि, हरचि तिलकुटियू बर्त, हरचि चैतौ पसरु, हरच्या पखंणा,पंवड़ा, हरच्या थड़या गीत, हरच्या पंडौं का मंडाण।। सनातनी छां सनातनी रावा, धर्म रालु त हम रौला, निथर बाटौ सी ढ़ुगेड़ु, खुटौंन कभी इनै कभी उनै।। क्वी धर्म बुरु नी, न ऊंका बार त्यौहार मणौणू, पर अपणा बार त्यौहार न भूला, बूढ़.बुढ्यों कि चौंठी भुक्कि पेईं,छा दुनिया मा कखि।। ःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःःःः