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राजी

  "राजी" ##### तु हां मा भी राजी, ना मा भी राजी, मजाक मा भी राजी, सज्जाक मा भी राजी। सुख मा भी राजी, दुःख मा भी राजी, तु हर धाणि मा राजी राजी।।   त्वे जणुणु, समझुणू, कथगा खपौंणू मुण्ड कपाळ, कुछ समझ नि औंणि, कुछ पल्ला नि पौंड़णू।  त्वे क्या समझूं, त्वे क्या जाणू, तु हर धाणि मा राजी राजी।। हैंसदि मुखड़ियू दुख दर्द, आंख्यूं रुकियूं उमाळ, भवस्यौंदा दिलौ बवंडर, त्वी जाणी, बाकी क्वी क्या जाणू , तु हर धाणि मा राजी राजी।। शिव चरणू, नतमस्तक छौं आज, दुःख दर्द मिटौन तेरा, खुशियों कि हो बहार। हर कैसे मिलु त्वे, प्यार ही प्यार, बाकी क्या मांगु त्वेकु, तु हर धाणि मा राजी राजी।।           कल्याण "दिल"

शब्द

  "शब्द" ####### हंसाते-रुलाते, गुदगुदाते-खिलखिलाते हो, मन-मस्तिष्क, बोलचाल-होंठों को हमारे। "दिल"भी खोया रहता है, तुम में हमारा, बांकपन के अपनेपन में, शब्द तुम्हारे।। अनकहे-अनलिखे हो सबके प्यारे, प्यार से संबंध लगते हैं तुम्हारे। होठों से निकलते ही, कागज पे उतरते ही, सब बंदी बना जाते हैं, शब्द तुम्हारे।। तुम्हें समझने की, सबकी समझ अलग, तुम एक, भाव-अर्थ अनेक तुम्हारे। बहुतों को लगते हो, कर्ण प्रिय तुम, बहुतों को चुभते हैं बाण, शब्द तुम्हारे।।      कल्याण सिंह चौहान "दिल"