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Showing posts from May, 2021

प्रश्न चिन्ह

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 ःःःः प्रश्न चिन्ह - PRASHN CHINH ःःःः        ःःःःःःःः कहां गया वह भाईचारा, कहां वह प्यार दुलार। क्यों गली गली लूट मची, क्यों मचा हाहाकार।। क्यों बज रही, अपनी अपनी ढपली। क्यों गा रहे सब, अपने अपने राग। क्यों मंडराता हरदम, मौत का साया। क्यों फैल रही, वैमनस्य की आग।। कहां गया....... क्यों क्षितिज पर छाई, घोर निराशा। क्यों धरती से उठती, प्रेम की आशा। क्यों हर आंख झरते, भय से मोती। क्यों बुझ रही, मानवता की ज्योति।। कहां गया..... मतलब का मतलब से ही है, अच्छा व्यवहार। कहीं भूखे नंगे बच्चे, कहीं मनते रोज त्यौहार। क्यों मां जाया भाई, भाई का दुश्मन बना है। क्यों अपना ही हाथ, अपनों के खून सना है।। कहां गया वह भाईचारा, कहां वह प्यार दुलार। क्यों गली गली लूट मची, क्यों मचा हाहाकार।।  ःःःः  कल्याण सिंह चौहान ःःःः

कविता है मेरी

 ःःःः  कविता है मेरी ःःःः        ःःःःःःःःःःःः गीत.प्रीत.मीत, संगी.साथी, धर्म.कर्म, पूजा.पाठ, याचना.अर्चना ही.. कविता है मेरी।। छलके आंसुओं, सूखे होंठों, कंपकंपाते हाथों की जुबान ही.. कविता है मेरी।। मेरी वीरांनगी की बहार, बरसते सावन की तड़फ ही.. कविता है मेरी।। जो हुआ न किसी का, वह "दिल" का अपना दर्द ही.. कविता है मेरी।। मेरे दिन की सोच, रातों के सपनों की कहानी ही.. कविता है मेरी।।        ःःःः कल्याण सिंह चौहान"दिल" ःःःः

सत्य मेव जय

 ःः। सत्य मेव जय ःः     ःःःःःःःःःः पर्वतों से बैठे हैं, भष्ट्र ऊंचे ऊंचे पदों पर, पेड़ों से चमचे खड़े हैं, कतारों मे।। ज्वलित कहीं दूर, चमकता उभरता स्वच्छ सा, निष्ठावान, कर्तव्य परायण, कोई शरीफ, दिए की लौ की तरह।। मचती है खलबली, समुद्र में तुफान आने की, होती है खबर कानोकान, इधर उधर सभी को, फिर शुरू होता है खेल, नगदम सुविधम लेनदेन, खरीद फरोख्त, भावताउ, हाटों मे पशुओं की तरह।। नहीं बेचता वह अपनी, निष्ठा, सज्जन स्वभाव, खाए देश के नमक को, चंद चांदी के टुकड़ों में, दौर शुरू होता है नया फिर, आतंकित, भयभीत, छबि खराब करने का, आते हैं गुंडे तुफानो की तरह।। देशभक्त, नेक सिपाही नहीं डिगता अपने पथ से, खड़ा रहता है, अटल सत्य मार्ग पर।। नीच, दुष्ट, खलकामी टूटने लगते हैं, रातों में तारों की तरह।। विजय घोष होता है चारों तरफ,  "सत्य मेव जयते" सूर्य के प्रकाश की तरह।।       कल्याण सिंह चौहान "दिल"

मेरु गौं "बकरोड़ा"

ःः मेरु गौं  "बकरोड़ा" ःः      ःःःःःःःःःःःः देवभूमि, खण्ड केदार, देवप्रयाग, पवित्र क्षेत्र। गौं मेरू, बकरोड़ा, पित्रू की थाती बकरोड़ा।। खेलणु कुदुणू, बोलण चलणू, सीखी मीन गौं (बकरोड़ा) की माटी।। गौं का लोग, मयदु मेरा। नी जणदा, नी करदा, तेरी मेरी, मेरी तेरी।। उखड़ि खेतीबाड़ी, फैलासौ बोण। पुरणौ की निशानी, "चेल" आम डाली।। पित्रू बकरोड़ा, ब्यूंतौ बसयूं। पूर्व दिशा सेमूलु डाली, पश्चिम दिशा पीपल डाली। उत्तर दिशा केमु डाली, दक्षिण दिशा पंयांपाती।। चमोली कंडाखोली, ढमोंड बंजाखोली। बकरोड़ा छोटि भूली, मलखोली। तिनि बैंणी, देवियूं कु रूप।। झालंदरा, झालीमाली, गौं की देवी। नागराजा, पित्रू की पूजा होली।।   ःः। कल्याण सिंह चौहान ःः

बडुली मैतै

 ःःःः  बडुली मैतै ःःःः         ःःःःःःःः घुटघुट बडुली लगी, ऐगी याद मैतै की। कख जाण,कैमु जाण, समलौण रैगि मैतै की।। बस छौंदु ब्बै बुब्बा, मैत होंदु बेटियूं कू। बाकी खुददै सिवै, क्वी नि पुछदु बेटियूं कू।। भग्यान न्यूती बुलला, पूजी पठेला बेटियूं कू। खूब होणि खाणि होली, दुआ फलली बेटियूं की।।   ब्बै बब्बुई कूड़ि जगदि रौ, आश बेटियूं की। भै भचदौंन डिंडलि, गुठ्यार भोरूंयू रौ गोरु की।। बेटियूं बुलौंदा छा, ब्यौ काज, देवता पुजै मा। बेटियूं कु देवी देवता भी अछप ह्वेन, पहाड़ मा।। एक आंसू दिशा ध्याणियू, काल बिणासौ कू। दिशा ध्याणियू सत, सत देवी "पारु" कू।।   ःः। कल्याण सिंह चौहान ःः

गौं रेणू

 ःःःः  गौं रेणू ःःःः         ःःःःःः गौं मा रेणू, मुश्किल ह्वेग्या। कुमरयाण माटै, क्वी बिष घोल ग्या। सेवासौंली छोड़ी, हलौ हाइ ह्वेग्या। चौंठी भुकि, खुटौं सेवा, बिसिरि ग्या।। घ्यू दूधै परया परोठी हरिचि गेन। थैल्या घ्यू दूधौ, रिवाज ह्वेग्या।। भै बंदी, रिस्तादारी सब फोनै ह्वेग्या। आवभगत भी सब, पैंछै रे ग्या।। लोग क्या, हम सभी मतलबी ह्वेग्यां। जौं सै मतलब, ऊं का रिस्तादार ह्वेग्यां।। पैलि एक चुल्है सै, सभी चुल्हौं की आग छै। आज एक हैका देखी, जलणै आग ह्वे ग्या।।         ःःःः  कल्याण सिंह चौहान ःःःः

हैंसणू

 ःःःः  हैंसणू  ःःःः       ःःःःःःःः हैंस्यां जमनु ह्वेगि,  हैंसदा कन बिसिरि गी। ब्बै, बुब्बा छौंदु, राज छौ हमरू। खिकताटा सिवै, क्या काज छौ हमरू।। ज्वनी देली, बढ़ेन जु खुटा। राजपाटै दगड़, खिकताट भी गै।। ज्वनी मा, मौजमस्ती सोचदा छा। खिकताट क्या, हैंसणू भी नि रै।। ब्बै, बुब्बा राज जनू, क्वी राज नि ह्वे। पुरणौ कु जनु, ठटा मखौल नि रै।     ःःःः  कल्याण सिंह चौहान ःःःः             

बदलाव

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 ःःःः  बदलाव - BADLAV ःःःः        ःःःःःःःःःः न जाने क्यों लोग चाहें, बदलाव मुझ में। अपने पहनावे, अपने तौर तरीकों की तरह।। मूर्ख गंवांर "दिल", क्या जाने बदलना। पलपल रंग बदलती, दुनिया की तरह।। मिट्टी पानी आसमान, न बदला है कभी। क्यों बदलें, समय किस्मत मौसम की तरह।। बदलाव अच्छी सोच, मानसिकता का हो। क्यों बदलें झूठी शान को, दगाबाजों की तरह।। जानते हैं हम, बदलाव दुनिया का नियम है। यह भी सच है, सच्चाई न बदली है कभी, झूठ की तरह।। न जाने क्यों लोग चाहें, बदलाव मुझ में। अपने पहनावे, अपने तौर तरीकों की तरह।।        ःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः

सोच

 ःःःः सोच ःःःः      ःःःःःःःः उठ कर्म कर, संसार से नाता जोड़। सोचने को दुनिया है, तू सोचना छोड़।। नजरों से गिरा के, शर्मसार कर, अपनो के होते, अकेला कर देगी यह सोच।। बीमार बना के, नाकारे का ठप्पा लगा, पागल कर, दरदर ठोकरें खिला देगी यह सोच।। विश्वास डिगा के, आंखों आंसू भर, निराश हो, चिता भस्म कर देगी यह सोच।। उठ कर्म कर, संसार से नाता जोड़। सोचने को दुनिया है, तू सोचना छोड़।।      ःःःः  कल्याण सिंह चौहान "दिल" ःःःः

फूल

 ःःःः  फूल  ःःःः       ःःःःः हंसना सीखो, जीना सीखो फूलों से। खिलता बारिश सावन.भादों की। सर्दी पूष.माघ, गर्मी बैशाख.जेठ की।। हंसना सीखो, जीना सीखो फूलों से झूमना, मुस्कराना सीखो फूलों से। खुश प्रभु चरण हों, या हो वैश्या घर। रौंदे पांव, कमी नहीं उसकी खुशबू मे।। हंसना सीखो, जीना सीखो फूलों से छेड़े भौंरें चाहे, चुटकी काटै तितली। झूमता मस्त देख के उनको। रंज नहीं जरा उसके मन मे। हंसना सीखो, जीना सीखो फूलों से उगता कीचड़, पलता कांटों। लालायित करता हर मन को। अपनी खुशबू, अपनी छटा से। हंसना सीखो, जीना सीखो फूलों से       ःः कल्याण सिंह चौहान ःः

कैसे भुलाऊं

 ःःःः  कैसे भुलाऊं  ःःः        ःःःःःःःःःःःः तुम तो कसमें, वादे, सब भुला के छोड़ चले। वह प्यारी अनुभूति कैसे भूलूं, जब तुम मिले।।   मेरी हर धड़कन आज भी, तुम्हारा नाम लेती है। प्यार के वह सुनहरे पल, श्वासें आज भी सेती हैं।। बादल बरस के गए, धरती कैसे गीलापन छूपाए। मेरी कोख से उपजे तुम्हारे, फूल को कैसे छुपाएं।। सूखने को हुआ आंचल, आंसू छलक के भिगो गए। यादें, जब दो जिस्म, एक जिस्म, एक धडकन हुए।। अब तुम बरसों न बरसों, आंखें तो बरसा ही करेंगी। आंखें अब तुम्हें नहीं, तुम्हारा प्रतिबिंब निहारा करेंगीं।।      ःःःः  कल्याण सिंह चौहान। ःःःः

कैदी पक्षी

 ःःःः  कैदी पक्षी ःःःः        ःःःःःःःःःः अच्छा घेरा डाला तुमने, बाहों का। जिससे निकल पाना, मुझे मुश्किल।। उसी मे कैद मेरे गीत, प्रीत, सुखदुःख। मेरे दिल की धड़कन, आश, विश्वास। मेरी श्वासों का अपना ही अस्थिपंजर।। उडने को होता, जब भी पागल पक्षी। बेदम हो गिर पड़ता है, बेहोश होकर। पिंजरे की सीखों से टकरा टकरा कर।। फिर उडने की वही चाहत होश आने पर। फिर वही कोशिश, वही दशा, वही भाव। न जाने कबतक, यह मरने जीने का क्रम।।        ःः  कल्याण सिंह चौहान ःः