चांदनी
ःःःः चांदनी ःःःः ःःःःःः चांदनी छिटकती/ बिखेरती मादकता, स्वच्छ, सौम्य, शीतल खामोश रात। मैं भी अकेले/वह भी अकेले/अकेले, खेलती रही वह/अपने मे मस्त, चूहे बिल्ली का खेल/ उनमुक्त भाव से, मेरे शरीर से/ सारी रात।। न वह थकी/ न रुकी मेरी चीख पुकार, मैं बेहाल / निढाल/ निस प्राण, सुबह होने/ खुलने तक रात, चांदनी चल दी/ नये शिकार की तलाश।। ःःःः कल्याण सिंह चौहान "दिल"