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Showing posts from August, 2022

चांदनी

ःःःः चांदनी ःःःः       ःःःःःः चांदनी छिटकती/ बिखेरती मादकता, स्वच्छ, सौम्य, शीतल खामोश रात। मैं भी अकेले/वह भी अकेले/अकेले, खेलती रही वह/अपने मे मस्त, चूहे बिल्ली का खेल/ उनमुक्त भाव से, मेरे शरीर से/ सारी रात।। न वह थकी/ न रुकी मेरी चीख पुकार, मैं बेहाल / निढाल/ निस प्राण, सुबह होने/ खुलने तक रात, चांदनी चल दी/ नये शिकार की तलाश।।         ःःःः कल्याण सिंह चौहान "दिल"

चाहत

 ःःःः चाहत ःःःः      ःःःःःःः एक दूसरे की चाहत को हम, अपनी बनायें। चाहत की चाहत को, अपनी चाहत बनायें।। मैं तुम्हें, तुम मुझे, अपने प्यार की चाहत बनाओ। मैं, न तुम, प्यार की चाहत के सिवाय कुछ चाहें।। अपनी चाहत, हर चाहत की, चाहत की पूजा हो। समर्पण की चाहत के सिवाय, न कोई चाहत हो।। चाहत हमारे दो शरीरों की, एक प्राण हो जाये। हमारे दिलों की चाहत,  एक धड़कन हो जाये।। धड़कन किस दिल की है, न समझ आये। मेरा दिल तुम्हारा, तुम्हारा दिल मेरा हो जाये।।        ःः कल्याण सिंह चौहान "दिल"

प्यार अंधा नहीं

ःः ःः प्यार अंधा नहीं ःःःः       ःःःःःःःःःःःः भीड़ मे गुमसुम, कुछ चंचल सी आंखें। अकेले में मुस्कराना, हवा से भी बातें। दिन देखता सपने, करवटें बदलती रातें।  प्यार अंधा नहीं, हैं बचपने की सी आदतें।। सपनों सा टूटना, बनाई हवाई मंजिलों का। याद कर कर के भी, याद न आना बातों का। रूठना मनाना है, छोटी छोटी सी बातों का। प्यार अंधा नहीं, घर है बचपन की आदतों का।। बिना सोचे तोड़ लाने, चांद तारों की बातें। निभे न निभे, साथ जीने मरने की कसमें। सब झूठ झूठे, स्वयं के सही होने के इरादे । प्यार अंधा नहीं, नाम है बचपन की जिदों का।।        ःः ःः कल्याण सिंह चौहान "दिल"