दूरिया


 ःःदूरियांःः

कितने पास हैं हम,
कहने को एक दूसरे के,
कि श्वांसे भी आपस मे टकराती हैं।

फिर भी न जाने क्यों,
रेल की पटरियों की तरह,
ये दिल नहीं मिल पाते।।

ःःःःकल्याणसिंह चौहानःःःःः

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