फकीर

                  

               ।ःःःःःफकीरःःःःः।।।
                    ःःःःःःःःःःःःःःः
 
                
अपना कुछ नही, सब कुछ खोकर भी।
उसे पाकर, कुछ नही, बहुत कुछ पा गया हॅू मैं।।
अपना कुछ नही, सब दाव हार कर भी।
उससे हारकर , बहुत कुछ जीत गया हॅू मैं।।
                
अपने से नही, अपनो से भी बहुत दूर होकर।
उसके करीब नहीं, बहुत करीब आ गया हॅू मैं।।
अपने गुनाहों-पुण्यों का, क्या हिसाब दूॅू।
उसके दीदार से, इन सबसे पार पा गया हूॅ मैं।।
                
अपने जीवन के पलपल का, क्या हिसाब दूॅ।
उसके प्यार के पल में, एक जीवन जी गया हॅू मैं।।
अपने सामने सब कुछ है, पर कुछ दिखता नहीं।
उसकी सांवली सूरत, अपनी आंखों बसा गया हूॅ मैं।।

          ।।ःःःःकल्याणसिंह चैहानःःःः।।

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