कुतरे पंख

 ःःःः कुतरे पंख ःःःः


स्वच्छंद, आजाद पंछी मैं, फंस बैठा,
सांसारिक मायामोह के जाल मे ।।

फंसा इसमें जो कोई भी,
कदम भर भी न हिल पाया जीवन भर।।

यूं तो बहुत से जालों से,
निकला व निकल सकता हूं मैं,
बहुतों को उड़ा व उड़ा के ले सकता हूं मैं ।।

बिन पिंजरे, बिन बेड़ी के भी,
बहुत सीमित हो गया हूं मैं ।

देखे थे जो ख्वाब मैंने, 
उनसे मीलों दूर हो गया हूं मैं ।

उडने क्या फुदकने से भी डरता हूं मैं,
निकलने के डर से नये पंंख,
मायावियों ने नोंचे नहीं,
केवल कुतरे हैं मेरे पंख ।।

ःःःः कल्याण सिंह चौहान ःःः

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