मेरी जीत
ःःःः मेरी जीत ःःःः
ःःःःःःःः
ःःःःःःःः
मैं गिर गिर के उठता रहा,
उठ उठ के भी गिरता रहा,
क्रम उठ-उठ के गिरने का,
गिर गिर के उठने का,
हर घड़ी, हर पल, हर क्षण,
नित्य यूं ही चलता रहा।
लेकिन चलता कब तक,
आखिर किसीको तो जीतना था,
और मैं जीत गया ।।
ःःःःकल्याणसिंह चौहान "दिल"
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