मां
।।ःः मां ःः।।
ःःःःःः
मांं पहला स्पर्श, पहली गुरु, पहली भगवान,
मांस पिण्ड संजोकर, मां ने डाली उसमें जान,
दुनिया मे अपनेपन की, मां है सच्ची पहचान,
धरती पर भगवान रूप मे, मां है प्यारा वरदान।।
मां की ममता बढ़कर है, दुनिया से सारी,
दुनिया के सब रिस्तों से, मां सबसे न्यारी,
छाया मेंं मां की, खिलती है बगिया प्यारी,
चरणों मे मां के, न्यौछावर है दुनिया सारी।।
कोई नहीं करता, मां करती जो रखवाली,
सुलाये बच्चे सूखे, मां गीले बिस्तर पे सोई,
मां के दूध का कर्ज, न उतार पाऐगा कोई,
जग बिछुड़े, ना बिछुड़े किसी की मां प्यारी।।
मां का लाड़ प्यार, स्वर्ग से बढ़कर,
मां का आंचल, त्रिलोकी से बढ़कर,
मां की गोदी, राजसिंहासन से बढ़कर,
मां रत्न, संसारी सब रत्नों से बढ़कर।।
ःःःःकल्याण सिंह चौहान "दिल" ःःःः
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