बुलबुले

 

।।।।ःः बुलबुले ःः।।।।
          ःःःःःःःःः

बुलबुले पानी के, होते हैं छणिक,
उठते हैं पल मे, हंसी खुशी से,
विलीन हो जाते हैं पल मे।।

कर जाते हैं, मोहित मन को,
पल भर मे ।।

गौर से देखो, जरा कभी,
ध्यान मग्न हो के ।।

कह जाते हैं वे कहानी,
इस संसार की,
कुछ ही छणों मे।

दे जाते हैं उपदेश,
 इस जग को।।

बदी छोड़, कर नेकि बंदे,
क्यों कि
मृत्यु सत्य, जग मिथ्या ।।

ःःःःकल्याणसिंह चौहानःःःःः

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