बूढ-बुढ्या

 ःःःःःः बूढ-बूढ्या ःःःःःः

        ःःःःःःःःः

गारु माटु जोड़ि-जाड़ि, जोड़ि-जाड़ी लखड़ा पतड़ा,
हडगि मुडगि तोड़ि ताड़ी, फंजोड़ि फंजाड़ि गतबस्त,
ल्वै का आंशु चुवैं-चुवैं, बणैई कूड़ि ।।

पालि सैंती, पढ़ै लिखै,
ज्वान पठ्ठा कै नि, खलै पिलै,
कर्जपात कैकि बिव्वैन, सम्पयूं खफा खाणुकू।।

जणि क्या लिख्यूंं, भाग हमरा,
नौनै दगड़ बुव्वारि चलिगि, बोलि मारिकी,
बाल बच्चों कु भविष्य देखण अपणा,
देश मा पढ़ै लिखै की।।

कै कु बोन, किलै बोन, समझौणु कू,
गौं कि पढ़ै लिखै बल गोरुवा लेख,
पढ़णवलौं कु घौर बोण एक पढ़ै लिखै,
बानु बच्चों कू, क्या कन लौड़ि की।।

बुढ-बुढ्या कूड़ि जगोलनान एखुलि,
उल्या-पल्या खाला/दासा बैठि की,
लोलि लालसा नि छुटदि अपणौ की,
आशा लगी रैंदि, मोन तकै की।।

बूढ़-बुढ्यों की डबलौंदि आंखि,
बबलौंदा होंठ, कंपदा हाथ-खुटा,
छौंदा कुटम्ब, हुंगरा देणू भी नी दगड़ क्वी।।

सच्चि बात, जगदि मुछेलि पिछने ही औंद,
औण सभ्यून ईंही उम्र, याद राखा सभी।।

 ःःःः  कल्याण सिंह चौहान "दिल ":::०::


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