को. रौ. णा.

  ःःःः ःः ( को.रौ.णा)ःःःःःः

 ःःःःःःःःःःः

क्या बोन, कन बिमरि ऐगि,  
क्यान ह्वे, किलै ह्वे, बिमरियू अतु न पतु,
न दारु,न दवै, कथगा मनखियूंन जान गवै।।

क्या बोन कन वक्त ऐगी, दुःखै त बाती नी च,
सुख मा भी क्वी, दगड़ नि रैगि,
को.रो.णा. नौ कि बिमरि ऐगि।।

कख ऊठि,कख बैठि,कख चलि पता नी च,
भगवानै बंणई दुनिया मा,
मनखियूं कि छेड़छाड़ौ नतीजा त नी च।।

शान शौकत, पैंसा धेला, सब धरियू रैगि,
छौंदा अपणा कुटुम्ब परिवार,
मनखि ईं बगमरि एखूलि ह्ववेगी।।

बोनान मनखि चंद्रमा, मंगल पौचिगि,
विज्ञान करणू च उन्नति, क्वी बताउ प्रयाय क्या खूनौ,
ईं बिमरि सब ह्वेग्या फेल।।

भौत मुस्का बंदेन गोरू, चखुला कैनि पिंजरा बंद,
वक्तै मार पोड़ि, मनखि मुस्का लगै घौरु बंद,
गोरु चखुला सब स्वछंद ।।

भै बंदू बोलचाल बंद, औणि जाणि अकड़ बंद,
वक्त न यन करि, मुर्दनी त बात क्या,
मुखजात्रौ भी नी मीलि छंद।।

अभी भी वक्त च,
 मनखि छां,मनख्यात मा रिया,
खाणु पेणु, बोनु चलणू मनखियूंन सी राखा ।।

ःः कल्याण सिंह चौहान ःःःः


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