श्रद्धेय नारी

 ःःःः श्रद्धेय नारी ःःःः
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तुम अबला, निर्बल शक्तिहीन, कमजोर, आंसू बहाती हो।
अज्ञानी, मूढ, पुरूष प्रद उपमाएं, तुम भी स्वीकारती हो।।

आज समय है, तुम्हारी हनुमान सी शक्ति जगाने का।
नारी प्रकाशपुंज, आकाश तक चहुंओर फैलाने का।।

तुम हो मां, पृथ्वी, अन्नपूर्णा, हो उत्पति संसार की।
तुम हो प्रेम, वात्सल्य, ममता, हो धारा करुणा की ।।

तुम प्रथम गुरू, प्रथम स्पर्श, हो प्रथम आश्रय।
तुम हो मां लक्ष्मी, मां सरस्वती, हो शक्ति श्रोत।।

वे कंधा से कंधा मिलाकर चलने को कहते हैं।
जिनका बोझ रोज तुम, अपने कंधों ढोती हो।।

नारी शक्ति तुम्हारी जय, तुम्हें सादर प्रणाम है।
पहले नाम तुम्हारा है, फिर आता राम श्याम हैं।।

सौ सवालों का एक जबाब, नारी विशाल है।
नारी अपने आप में, दुनिया मे एक मिशाल है।।

      कल्याण सिंह चौहान "दिल"

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