सरिता

 ःःःः। सरिता ।ःःःः
       ःःःःःःः 

सरिता इक प्यासी धारा,
निरंतर बहती, अपने पथ,
आश मिलन प्रियतम की ।।

थकेहारे प्यासे, हुए तरोताजा,
आके तुम्हारे किनारों पर,
प्यासा जाने, प्यास बुझी या बढ़ी।।

तुम अपने पथ, आगे बढ़ चली,
पीछे छूटे सब, रिस्ते भूल गई,
बिरह अग्नि तड़फने, छोड़ गई।।

प्रेम पवित्र हुआ कोई, डुबकी लगा, 
भव पार हुआ कोई, तुममें डूब के,
कोई आते जाते भावों, खो गया।।

तुम बढ़ती, मैली हो खारा होने,
दुनिया पवित्र माने तुम्हें,
सच तुम जानो या प्रभु जाने।।
सरिता इक प्यासी धारा।।

       कल्याण सिंह चौहान

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