मुक्ति द्वार
ःःःः मुक्ति द्वार ःःःः
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मादक मंद पवन का झोखा, छेड़ गया मन के तार।
खुशबू उन्मत उसकी, मैं श्वास लू छोड़ू भूल गया।।
हल्की आहट उसके कदमों की, कानों मिश्री घोले।
आती हर आहट पर, धड़कना दिल का बढ़ गया।।
दोस्त बदलते हैं लोग, अपनी जरूरतों के हिसाब से।
दोस्त नहीं जरूरतें बदली मैंने, दोस्ती के हिसाब से ।।
चाहत मेरी, एक झलक देख पाने की सूरत उसकी।
मेरे अंतरमन के विश्वास का, पक्का सहारा हो गया।।
देखी जो मन मे बसी सूरत, मैं होसोहवास खो बैठा।
क्या नजारा था वह, "दिल" पलक झपकना भूल गया।।
जीवन भर लवों पर ही, गुनगुनाता रहा जो नाम।
अंतिम छणों वही "राम" नाम, मुक्ति द्वार हो गया।।
ःः कल्याण सिंह चौहान। ःः
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