कैदी पक्षी

 ःःःः  कैदी पक्षी ःःःः
       ःःःःःःःःःः

अच्छा घेरा डाला तुमने, बाहों का।
जिससे निकल पाना, मुझे मुश्किल।।

उसी मे कैद मेरे गीत, प्रीत, सुखदुःख।
मेरे दिल की धड़कन, आश, विश्वास।
मेरी श्वासों का अपना ही अस्थिपंजर।।

उडने को होता, जब भी पागल पक्षी।
बेदम हो गिर पड़ता है, बेहोश होकर।
पिंजरे की सीखों से टकरा टकरा कर।।

फिर उडने की वही चाहत होश आने पर।
फिर वही कोशिश, वही दशा, वही भाव।
न जाने कबतक, यह मरने जीने का क्रम।।
       ःः  कल्याण सिंह चौहान ःः

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम रंगोत्सव

बुढ़ा न बोलो

बड़ै तेरी