सोच
ःःःः सोच ःःःः
ःःःःःःःः
उठ कर्म कर, संसार से नाता जोड़।
सोचने को दुनिया है, तू सोचना छोड़।।
नजरों से गिरा के, शर्मसार कर,
अपनो के होते, अकेला कर देगी यह सोच।।
बीमार बना के, नाकारे का ठप्पा लगा,
पागल कर, दरदर ठोकरें खिला देगी यह सोच।।
विश्वास डिगा के, आंखों आंसू भर,
निराश हो, चिता भस्म कर देगी यह सोच।।
उठ कर्म कर, संसार से नाता जोड़।
सोचने को दुनिया है, तू सोचना छोड़।।
ःःःः कल्याण सिंह चौहान "दिल" ःःःः
Comments
Post a Comment