मानव सावधान

 ःःःः  मानव सावधान ःःःः
          ःःःःःःःःःःः

धरती बरबाद कर, चांद, मंगल पर तू पहुंच चुका।
प्राकृतिक सौंदर्य मिटा, पृथ्वी संतुलन तू बिगाड़ चुका।।

समृद्ध सनातनी शिक्षा भूल, तू कौन सी शिक्षा पढ़ रहा।
विज्ञान विश्व कल्याण को हो, तू विनाश को पढ़ रहा।।

अपने सुसंस्कार छोड़, तू प्यार भाव भुला चुका।
धौंस जमाने जमाने पर, वैमनस्य तू बढ़ा चुका।।

अणु परमाणु जैविक बम बना, तू इठलाता फिरता है।
हवा पानी घौले जो जहर, उसे शुध्द करके तो दिखा।।

साथ कुछ जाना नहीं, बस अच्चाई ही याद रहनी है।
अपना सुख चैन गंवा, क्यों विनाश मार्ग बढ़ रहा।।

जिसे तू अब खुश हो, अपना नया अविष्कार कहता है।
मानव उन्नति को, सनातन लाखों वर्ष पहले कर चुका।।

            ःः कल्याण सिंह चौहान ःः

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