अकेले हूं

 ःःःः  अकेले हूं ःःःः
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न कोई साथ था, न कोई साथ है, न कोई साथ होगा।
छलावा है सब, साथ है सबका, सबका साथ होगा।।

मलमूत्र युक्त अंधकूप से निकला मैं, चीरता अंधेरा।
दण्डवत कर प्रणाम, खूब रोया देख माया का घेरा।।

जीवन सफर मे, कुछ लोग जुड़ते, कुछ छूटते रहे।
एक पड़ाव आया सफर मे, जहां बहुत रुकना पड़ा।
कुछ कर्ज उतारने, कुछ जिम्मेदारियां निभाने।
कुछ से लगाव हुआ, कुछ से जुड़ना पड़ा।।

जोश चढ़ती जवानी, उभाल गर्म खून का था।
चेहरे पे पैंसौं की लाली, बहुतों का मैं प्यार था।।

यौवन के खिले रंग रूप का,  हर कोई दिवाना है।
झुर्रियों युक्त लटकते चेहरे से, करता कौन प्यार है।।

दांत आंख कान, अंग अंग शिथिल होते गए।
थकता शरीर, नित नियम चलता सफर।
पत्नी बच्चे घर पे ही छूटे, भाई बंधु सब शमशान।
अकेले ही अंतिम सफर पर, निकले अकेले प्राण।।

आगे भी, पीछे भी प्राण, दांये भी, बांये भी प्राण।
उपर भी, नीचे भी प्राण, बीच मे भी प्राण ही प्राण।।

न कोई साथ था, न कोई साथ है, न कोई साथ होगा।
छलावा है सब, साथ है सबका, सबका साथ होगा।।

            ......कल्याण सिंह चौहान...


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