अपनी बेबसी

ःःःः  अपनी बेबसी ःःःः
ःःःःःःःःःःःःःःःःःः

अपनी बेबसी की व्यथा, क्या सुनाऊं किसी को।
कहने को सब हैं मेरे, पर मुझ से क्या किसी को।।

मुझसे अपने मतलब की, उम्मीद है हर किसी को।
अपनी उम्मीद के सिवाय, मुझसे क्या किसी को।।

सच है, मेरा अपना सब कुछ है, मेरे अपनों को।
मेरे सिवाय, मेरा सब कुछ चाहिए, हर किसी को।।

दिन रात एक किये मैंने, जिनकी की खुशियों को।
मेरे पास एक पल, रूकने का समय नहीं किसी को।।

शिथिल होती देह मेरी, अखरने लगी, मेरे ही अपनों को।
राम सा सत्य है जो, इंतजार है उस पल का हर किसी को।।

  ःःःः  कल्याण सिंह चौहान ःःः

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