प्रभु रूप प्रेम
:::: प्रभु रूप प्रेम ::::
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बिछोह प्यार प्रेम जगती ज्योत, मीरा अमर है।
विरह अग्नि तपा प्रेम प्रभु रूप, उद्धव साक्षी है।।
अटूट प्रेम विश्वास गोपियों को, कान्हा पर है।
प्रभु एक, रास सब गोपियों संग, एक साथ है।।
वासनायुक्त आकर्षण प्रेम नहीं, विराट सभा कीच है।
समर्पित मनचित द्यूतसभा द्रोपदी, प्रभु साड़ि बीच है।
हीर-रांझा, सिरि-फरहाद, अमर विरह प्रेम गीत है।
प्रेम स्वरुप कृष्ण से पहले, राधा बोलने की रीत है।।
:::: कल्याण सिंह चौहान "दिल":::::
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