ढलती उम्र -जबाब
"ढलती उम्र -जबाब"
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मेरा लिखना,
देख के उसकी निस्वार्थ सेवा भाव,
"दिल" की कली, सुमन हो खिल उठी।।
वह नाराज़ हो गये,
कि तुमने ऐसा क्यों लिखा।।
कैसे समझाऊं, किसे समझाऊं,
कि किसके लिए लिखा हमने।।
मैं जानू, मेरा दिल जाने या मेरे प्रभु जाने,
तुम क्यों परेशान, जब तुम्हारे दिल में कुछ नहीं,
तुम ही बताओ, तुम ही बताओ।।
::::: कल्याण सिंह चौहान "दिल"::::::
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