शब्द

 "शब्द"
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हंसाते-रुलाते, गुदगुदाते-खिलखिलाते हो,
मन-मस्तिष्क, बोलचाल-होंठों को हमारे।
"दिल"भी खोया रहता है, तुम में हमारा,
बांकपन के अपनेपन में, शब्द तुम्हारे।।

अनकहे-अनलिखे हो सबके प्यारे,
प्यार से संबंध लगते हैं तुम्हारे।
होठों से निकलते ही, कागज पे उतरते ही,
सब बंदी बना जाते हैं, शब्द तुम्हारे।।

तुम्हें समझने की, सबकी समझ अलग,
तुम एक, भाव-अर्थ अनेक तुम्हारे।
बहुतों को लगते हो, कर्ण प्रिय तुम,
बहुतों को चुभते हैं बाण, शब्द तुम्हारे।।

     कल्याण सिंह चौहान "दिल"

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