मोहन

           मोहन
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लिए चूड़ी नगों की गठरी, व्यापारी बने हो मोहन।
बहाना नगों का, तुम दिलों के सौदागर हो मोहन।।

तुम मिले, या जो मिला तुमसे मोहन एकबार।
हर कली मुस्कराई, खुले हर दिल के प्रेम द्वार।।

भला न कर सके मोहन, तो बुरा किसी का किया नहीं।
सत्य कह दिया मूंह पर, धोखा किसी को दिया नहीं ।।

हर आंख हर दिल, तुम्हें देखने-मिलने को बेकरार मोहन।
मूंह की मिठास, दिल का प्यार, हो मौसम की बहार मोहन ।।
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                कल्याण सिंह चौहान "दिल"

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