चाय प्यारी मुझे

           चाय प्यारी मुझे 
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चाय बहुत प्यारी चाहत है मेरी, सब जगह इसका राज है।
कप भर के जहां मिल जाए, वहीं मेरे लिए शुभ कार्य है।।

चूल्हा हवन कुंड मेरे लिए, जलती लकड़ी हवन सामग्री है।
केतली प्रसाद का वर्तन, उभलती चाय मंदिर का प्रसाद है।।

गर्म गर्म चाय देख, मन मेरा बेचैन हो बहुत ललचाता है।
घुट एक घूंट पी,  बेजान शरीर में प्राण सा आ जाता है।।

सनातन के सोलह संस्कारों में, चाय का ही बोलबाला है।
चाय न पूछो तो कहते हैं, चाय की भी औकात नहीं है।।

कोई भी कार्य, बैठक, समारोह हो, कभी भी, कहीं भी।
पहले चाय से खातिरदारी फिर कार्य, चला नया रिवाज है।

                     कल्याण सिंह चौहान "दिल"

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